वैश्विक परिप्रेक्ष्य में साइबर आतंकवाद: एक विधिक एवं नीतिगत विश्लेषण
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https://doi.org/10.65785/aqnjv414सार
डिजिटल क्रांति के इस युग में साइबर आतंकवाद एक भयावह वैश्विक चुनौती बनकर उभरा है, जिसके साथ-साथ इसका विधिक एवं नीतिगत आयाम भी अत्यंत जटिल होता जा रहा है। यह शोध वैश्विक स्तर पर साइबर आतंकवाद की प्रकृति, प्रवृत्तियों एवं प्रभावित क्षेत्रों का विश्लेषण करते हुए इससे जुड़े भारतीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विधिक ढाँचे का परीक्षण करता है। अध्ययन का स्वरूप वर्णनात्मक-अन्वेषणात्मक है तथा यह द्वितीयक आँकड़ा विश्लेषण पद्धति पर आधारित है। शोध में सर्वप्रथम साइबर आतंकवाद, साइबर युद्ध, साइबर जासूसी, साइबर अपराध एवं हैक्टिविज़्म जैसी संकल्पनाओं को स्पष्ट रूप से विभेदित किया गया है। तत्पश्चात् सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (विशेषतः धारा 66-च, 69, 70, 70-क एवं 70-ख), डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, 2013, सीईआरटी-इन निर्देश, 2022 तथा बुडापेस्ट कन्वेंशन, टैलिन मैनुअल एवं संयुक्त राष्ट्र की साइबर मानदंड प्रक्रियाओं जैसे अंतर्राष्ट्रीय उपकरणों का विश्लेषण किया गया है। श्रेया सिंघल, अनुराधा भसीन एवं पुट्टास्वामी जैसे न्यायिक निर्णयों के माध्यम से इस क्षेत्र के संवैधानिक आयाम को रेखांकित किया गया है। उपलब्ध साक्ष्यों से प्रतीत होता है कि महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर हमले 2019 से 2025 के मध्य तीव्रता से बढ़े हैं तथा राज्य-प्रायोजित साइबर आक्रमण भू-राजनीतिक तनाव के काल में और सघन होते हैं। निष्कर्षतः साइबर आतंकवाद अब केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है, जिससे निपटने हेतु सुदृढ़ विधिक ढाँचा एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है।
Keywords: साइबर आतंकवाद, धारा 66-च, राज्य-प्रायोजित साइबर हमले, महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना, बुडापेस्ट कन्वेंशन, साइबर सुरक्षा नीति
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