प्रमुख भारतीय आर्थिक विचारकों के सिद्धांतों की समकालीन प्रासंगिकता: दादाभाई नौरोजी से गोपाल कृष्ण गोखले तक एक अध्ययन

लेखक

  • आत्मदेव पाठक शोधार्थी, अर्थशास्त्र विभाग, राजकीय महाविद्यालय मांट, मथुरा ##default.groups.name.author##
  • डॉ. प्रिया आनिल मित्तल असिस्टेंट प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, राजकीय महाविद्यालय मांट, मथुरा ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.65785/q8360s80

सार

भारतीय आर्थिक चिंतन का विकास औपनिवेशिक काल में एक क्रांतिकारी प्रक्रिया थी जिसमें भारतीय विचारकों ने पश्चिमी आर्थिक सिद्धांतों को चुनौती दी और अपने मौलिक विचार प्रस्तुत किए। यह अध्ययन दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविन्द रानाडे, रोमेशचन्द्र दत्त और गोपाल कृष्ण गोखले के आर्थिक सिद्धांतों की समकालीन प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है। यह शोध ऐतिहासिक-तुलनात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए भारतीय विद्वान संग्रह, सरकारी रिपोर्टों और प्रमाणित अकादमिक स्रोतों से द्वितीयक जानकारी एकत्र करता है। अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष दर्शाते हैं कि इन विचारकों के सिद्धांत आर्थिक शोषण, औद्योगीकरण, कृषि विकास और जनकल्याण वर्तमान भारत की आर्थिक असमानता, गरीबी, टिकाऊ विकास और समावेशी वृद्धि जैसी समस्याओं के समाधान में अत्यंत प्रासंगिक हैं। इन विचारों की आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्याख्या राष्ट्रीय आर्थिक नीति निर्माण को अधिक समावेशी, न्यायसंगत और टिकाऊ बना सकती है। अतः भारतीय आर्थिक चिंतन की विरासत को समझना और लागू करना वर्तमान आर्थिक संकटों के समाधान के लिए आवश्यक है।

मुख्य शब्द: भारतीय आर्थिक चिंतन, दादाभाई नौरोजी, आर्थिक शोषण, समावेशी विकास, गोपाल कृष्ण गोखले

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प्रकाशित

2026-03-31

अंक

खंड

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