अग्निविद्या की वैदिक मीमांसा: आरम्भिक योग साधना के परिप्रेक्ष्य में

Authors

  • डॉ. अखिलेश कुमार विश्वकर्मा सहायक प्राध्यापक (अष्टांग योग विभाग) लकुलीश योग विश्वविद्यालय, गुजरात Author
  • डॉ. उपेन्द्र बाबू खत्री सहायक प्राध्यापक (योग विज्ञान विभाग) साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, साँची (मध्य प्रदेश) Author

DOI:

https://doi.org/10.65785/vijact.v2i4.30

Abstract

भारतीय संस्कृति हमेशा प्रकृति पूजक रही है। जिसमें प्रतीक उपासना का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वेदों में पृथ्वी स्थानीय देवताओं में अग्निदेवता को प्रथम एवं प्रमुख स्थान प्राप्त है। यजुर्वेद के प्रमुख देवता अग्निदेवता ही हैं। अग्नि का देवत्व चारों वेदों की संहिताओं, ब्राह्मणों, आरण्यकों, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में प्रतिष्ठित है। ऋग्वेद का प्रथमसूक्त अग्नि-सूक्त अग्निदेवता के वैशिष्टय को स्पष्टतः प्रतिपादित करता है। वैदिक साहित्य में अग्निदेवता की विविध उपमाओं से स्तुति की गई है। शतपथ ब्राह्मण अग्निदेवता को समस्त देवताओं की आत्मा से विभूषित करता है। अग्नि ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य देवताओं को अपनी भावनाओं सहित भोज्य पदार्थ प्रेषित करते हैं। अग्नि से मनुष्य का आजीवन सम्बन्ध रहता है। अग्नि उपासना इस सम्बन्ध को और अधिक प्रगाढ़ता प्रदान करती है। अग्नि के समस्त प्रकार, प्रयोग, प्रयोजन एवं अग्नि उपासना की प्रविधियों का ज्ञान ही अग्निविद्या कहलाती है। जिसके अनुष्ठान से साधक अपने जीवन के परम साध्य को प्राप्त करता है। इसीलिए आत्मसाधना में रत योगियों के लिए अग्निविद्या को समझना एवं अग्नि उपासना करना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। योगाग्नि से तप्त एवं अग्नि उपासना से युक्त साधक समस्त क्लेशों, दोषों, विक्षेपों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। योग साधकों के लिए अग्नि परम गुरू की भूमिका में समस्त दोषों का हरण और शक्ति का वरण प्रदान करने वाली होती है। इसलिए अग्निविद्या को जानकर समस्त योग साधक को नित्यप्रति अग्नि उपासना करनी चाहिए। अतः यह शोध-पत्र वैदिक सन्दर्भों के अनुरूप यौगिक जीवन में अग्निविद्या की महत्ता का प्रतिपादन करता है।

मुख्य शब्द: अग्नि, अग्निदेवता, वैदिक मीमांसा, योगाग्नि, अग्नि उपासना, अग्निविद्या

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Published

2026-04-30

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How to Cite

अग्निविद्या की वैदिक मीमांसा: आरम्भिक योग साधना के परिप्रेक्ष्य में. (2026). VED International Journal of Arts, Commerce and Technology, 2(4), 01-06. https://doi.org/10.65785/vijact.v2i4.30